नवजात शिशु स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए ‘पहुंच’ और ‘पहचान’ जरूरी

पटना:-डॉक्टर साहब ने कहा, थोड़ी देर और हो जाती… एसएनसीयू की सुविधा पास में ही थी, पर हमें पता ही नहीं था कि हमारे बच्चे को सिर्फ खांसी नहीं, जानलेवा संक्रमण है। सबसे बड़ी देरी तो हमें पहचानने में हुई। डुमरा प्रखंड में रहने वाले प्रदीप भगत आश्चर्य से भर जाते हैं। उनके 10 दिन के बच्चे को एसएनसीयू में खांसी की शिकायत पर भर्ती कराया गया था। ये किसी एक प्रदीप की कहानी नहीं है बल्कि हर उस प्रदीप की कहानी है जो नवजातों में खतरों को सही समय पर भांप नहीं पाते। राज्य में नवजात स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। नालंदा मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ सरोज कुमार सिंह ने कहा कि ‘पहला कदम’ नवजात शिशु को देखभाल की ‘पहुंच’ प्रदान करना है, और ‘दूसरा कदम’ खतरे में पड़े या बीमार शिशुओं की ‘पहचान’ करना और उनका उचित इलाज सुनिश्चित करना है।                             यह दोनों पहलू मिलकर नवजात मृत्यु दर को कम करने की दिशा में कार्य करते हैं। विभाग के अनुसार शिशु स्वास्थ्य नवजात शिशु स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए राज्य के 35 जिला अस्पतालों तथा 10 मेडिकल कॉलेजों में एसएनसीयू संचालित किए जा रहे हैं। वहीँ नवजातों में वित्तीय वर्ष 2025—26 के अंत तक ज्यादा डिलीवरी लोड वाले 115 प्राथमिक रेफरल अस्पतालों में एनबीएसयू को समृद्ध किया जाएगा, ताकि संस्थागत प्रसव हुए कमजोर नवजातों को बेहतर चिकित्सीय सुविधा मिल सके l राज्य में नवजातों (जीरो से 28 दिन) के लिए स्थापित स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में चिकित्सीय उपचार के लिए एसओपी को भी लागू किया गया है । पिछले एक वर्ष के दौरान एसएनसीयू में नवजातों की मृत्यु दर 5 से 3 पर आ गई है। राज्य में नवजातों (जीरो से 28 दिन) के मृत्यु दर का यह आंकड़ा डब्ल्यूएचओ के स्तर से बेहतर है। शीघ्र स्क्रीनिंग और रेफरल जरुरी:-नवजात शिशु की स्क्रीनिंग करके जन्मजात दोषों या आनुवंशिक विकारों की पहचान करना भी ‘पहचान’ का हिस्सा है। एक बार खतरा या बीमारी पहचान ली जाए, तो सबसे महत्वपूर्ण कदम शिशु को बिना किसी देरी के उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्र, जैसे विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई में रेफर करना होता है। इसके लिए समुदाय स्तर पर लोगों को जागरूक करना जरुरी हैl आशा कार्यकर्ताओं को खतरे के चेतावनी संकेतों को पहचानने का प्रशिक्षण देकर खतरे की पहचान दिया जाता है। इन संकेतों में दूध न पीना या उल्टी करना, तेज बुखार या शरीर का अत्यधिक ठंडा पड़ना, साँस लेने में कठिनाई या तेजी से साँस लेना शामिल हैं।

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