कानों को ठंड से बचाना फैशन नहीं, जीवन रक्षा है? जानें 10 चौंकाने वाले सच!

डेस्क:-सर्दियों की दस्तक होते ही हम भारी जैकेट और दस्ताने तो निकाल लेते हैं, लेकिन अक्सर कानों को खुला छोड़ देते हैं। क्या आप जानते हैं कि आपके कान केवल सुनने के अंग नहीं हैं, बल्कि वे आपके शरीर के ‘थर्मोस्टेट’ (तापमान नियंत्रक) की सबसे कमजोर कड़ी हैं? चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद दोनों ही मानते हैं कि कानों के जरिए घुसने वाली ठंड सीधे आपके मस्तिष्क और हृदय प्रणाली को प्रभावित कर सकती है। आज की इस विशेष रिपोर्ट में हम उन रहस्यों को खोलेंगे कि क्यों कानों को ढकना आपकी सेहत के लिए ‘सुरक्षा कवच’ की तरह काम करता है।

🧠 क्यों है कानों को बचाना इतना जरूरी?
कान की बनावट में मांसपेशियों या वसा (Fat) की कोई सुरक्षात्मक परत नहीं होती। यहाँ की त्वचा के ठीक नीचे तंत्रिकाओं (Nerves) का जाल होता है। जब ठंडी हवा सीधे कान के पर्दे और नलिका से टकराती है, तो यह शरीर के ‘कोर टेम्परेचर’ को तेजी से गिरा सकती है, जिससे ‘थर्मल शॉक’ का खतरा बढ़ जाता है।

🤫 10 दुर्लभ और अज्ञात ‘सच’ (10 Rare & Unknown Facts)
दिमाग का सीधा कनेक्शन: कानों के पीछे ‘वेगस नर्व’ (Vagus Nerve) की शाखाएं होती हैं। यहाँ अत्यधिक ठंड लगने पर यह नस उत्तेजित हो जाती है, जिससे अचानक चक्कर आना (Vertigo) या सिरदर्द शुरू हो सकता है।

कानों की अपनी ‘हड्डी’ का बढ़ना (Exostosis): जो लोग ठंडी हवा में कानों को खुला रखते हैं, उनके कान की नली में रक्षा तंत्र के रूप में अतिरिक्त हड्डी बढ़ने लगती है। इसे ‘सर्फर्स ईयर’ (Surfer’s Ear) कहते हैं, जो सुनने की क्षमता कम कर सकता है।

चेहरे का लकवा (Bell’s Palsy): कड़ाके की ठंड में कान के पीछे से गुजरने वाली ‘फेशियल नर्व’ में सूजन आ सकती है। इससे चेहरे के एक तरफ की मांसपेशियों में अस्थायी लकवा होने का खतरा रहता है।

पाचन से संबंध: आयुर्वेद के अनुसार, कानों का सीधा संबंध ‘वात’ दोष से है। कानों में ठंड लगने से पेट में गैस, मरोड़ और अपच की समस्या अचानक बढ़ सकती है।

ब्लड प्रेशर का जंप: कान ठंडे होने पर शरीर की नसें संकुचित हो जाती हैं। यह संकुचन ब्लड प्रेशर को अचानक 10-15 पॉइंट बढ़ा सकता है, जो बुजुर्गों के लिए खतरनाक है।

संतुलन और ‘इन्नर ईयर’: कान के भीतर तरल पदार्थ होता है जो शरीर का संतुलन (Balance) बनाए रखता है। अत्यधिक ठंड इस तरल के दबाव को प्रभावित कर सकती है, जिससे चलते समय लड़खड़ाने का अहसास हो सकता है।

दांतों का दर्द: कई बार हमें लगता है कि दांत में कैविटी है, लेकिन असल में वह कान की नसों में ठंड लगने के कारण होने वाला ‘रेफर्ड पेन’ होता है।

इम्यूनिटी का गिरना: कान ठंडे रहने से शरीर की ऊर्जा केवल उन्हें गर्म रखने में खर्च होती है, जिससे संक्रमण से लड़ने वाली सफेद रक्त कोशिकाएं (WBC) कमजोर पड़ जाती हैं।

कान का ‘वैक्स’ और सुरक्षा: ठंड में कान का वैक्स (Earwax) सख्त हो जाता है, जिससे कान में खुजली और संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है।

सर्दियों का एंग्जायटी अटैक: कानों के जरिए जाने वाली ठंडी हवा सीधे ‘सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम’ को सक्रिय कर देती है, जिससे बिना कारण घबराहट और बेचैनी महसूस होने लगती है।

🛡️ कैसे करें बचाव? (Safety Tips)
मफलर या मंकी कैप: मफलर को इस तरह लपेटें कि कान पूरी तरह ढके रहें।

रुई का प्रयोग: यदि बहुत ज्यादा हवा चल रही है, तो कानों में हल्की रुई (Cotton ball) डालना एक प्रभावी ‘विंड-ब्रेकर’ का काम करता है।

बादाम या तिल का तेल: नहाने के बाद कान के बाहरी हिस्से और पीछे तेल की एक बूंद लगाएं। यह एक ‘इंसुलेटिंग लेयर’ बनाता है।

💡 निष्कर्ष
आपके कान आपके शरीर की खिड़कियां हैं। यदि इन खिड़कियों से ठंडी हवा अंदर आएगी, तो पूरे ‘घर’ (शरीर) का तापमान बिगड़ जाएगा। इस सर्दी, स्टाइल के साथ-साथ अपनी इन नाजुक इंद्रियों का ख्याल जरूर रखें।
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