के. के. मंडल का निधन सामाजिक मंचों का अभिभावक के जाने जैसा:-डॉ. राठौर

मधेपुरा:-पूर्व प्रतिकुलपति प्रो. के. के. मंडल शनिवार को देर रात हुई निधन पर शिक्षा जगत और अन्य स्तरों पर लोगों ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।         विगत कई वर्षों से शैक्षणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मंचों पर उनके साथ रहे आजाद पुस्तकालय के सचिव डॉक्टर हर्ष वर्धन सिंह राठौर ने उनके निधन को शिक्षा जगत की जहां अपूरणीय क्षति बताया वहीं कहा कि सामाजिक मंचों पर मधेपुरा ने अपना एक सजग अभिभावक खो दिया।राठौर ने कहा कि शिव राजेश्वरी के अधिकांश बड़े महोत्सवों एवं आजाद पुस्तकालय के शिलान्यास में वो मुख्य आकर्षण ही नहीं बल्कि अभिभावक की भूमिका में रहे।शिक्षा के क्षेत्र में रचनात्मक कार्यों से जुड़े रहने के कारण उनका विशेष लगाव रहा। विभिन्न विषयों पर घंटों बात करते थे मंडल जी:-डॉक्टर राठौर बताते हैं कि प्रो के के मंडल राजनीति शास्त्र के सिर्फ विद्वान ही नहीं थे बल्कि विभिन्न विषयों पर बड़ी गहरी समझ रखते थे। उनके आवास पर अक्सर चर्चा में घंटों कैसे बीत जाता था यह पता नहीं चलता था।           अपने जीवन के आखिरी दिनों तक मंगलवार को हनुमान जी की पूजा अर्चना और आगंतुकों को शौक से प्रसाद स्वरूप लड्डू खिलाना उनकी दिनचर्या का खास हिस्सा बना रहा। शिक्षक से प्रतिकुलपति तक का किया सफर:-विगत कुछ वर्षों से लगातार उनसे जुड़े रहे राठोर बताते हैं कि प्रो. के के मंडल का जन्म 19 नवंबर 1943 को सहरसा जिले के अतलखा गांव में हुआ लेकिन उनके जीवन का अधिकांश समय मुख्य रूप से मधेपुरा जिला मुख्यालय के वार्ड नंबर 18 विद्यापुरी मोहल्ला में ही रहे।           पटना विश्वविद्यालय से एम ए और बिहार विश्वविद्यालय से पीएचडी कर ग्यारह जनवरी 1965 को को टी पी कॉलेज में व्याख्याता से सेवा की सफर करने वाले प्रो. के के मंडल आठ जनवरी 1981 से जहां चौदह मार्च 2001 तक कॉमर्स कॉलेज मधेपुरा के प्रधानाचार्य रहे वहीं पार्वती साइंस कॉलेज में पंद्रह मार्च 2001 से 31 जनवरी 2003 और एम एल टी कॉलेज सहरसा में 31 जनवरी 2003 से 30 नवंबर 2003 तक प्रधानाचार्य की सेवा दी भुपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान के संकायाध्यक्ष भूमिका को भी बखूबी निभाया।           साल 2004 में 12 दिसंबर को उनके जीवन में वो सुनहरा पल भी आया जब बिहार के राज्यपाल ने उन्हें तिलकामांझी विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति की जिम्मेदारी सौंपी जिसे उन्होंने बखूबी 12 दिसंबर 2007 तक निभाया।विभिन्न अवसरों पर प्रभारी कुलपति की भूमिका मिली जिसे भी उन्होंने ईमानदारी से निभाया। राठौर कहते हैं कि कई अवसरों पर चर्चा के दौरान वो बताते थे कुलपति बनने का अवसर आया लेकिन कुछ स्तरों की राजनीति आड़े आई।यह एक संयोग भी रहा कि इनके बड़े भाई कुलपति रहे और ये प्रतिकुलपति यानी रिश्ते के साथ निजी जिंदगी की उपलब्धि में भी बड़े छोटे भाई का ही नजारा रहा।    सामाजिक सांस्कृतिक मंचों पर आखिरी समय तक रहे सक्रिय:-डॉक्टर हर्षवर्धन सिंह राठौर ने कहा कि विद्वता के धनी प्रो के के मंडल जीवन के आखिरी दिनों में सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक मंचों पर खासे सक्रिय रहे।आजाद पुस्तकालय के संरक्षक मंडल सदस्य, भूपेंद्र विचार मंच, कोशिकी हिंदी साहित्य सम्मेलन,डॉक्टर राम मनोहर लोहिया सामाजिक एवं राजनीतिक संस्थान,वरिष्ठ नागरिक संघ के जहां अध्यक्ष रहे वहीं बिहार कला संस्कृति विभाग पटना, काशी प्र.जायसवाल शोध संस्थान के सदस्य ही नहीं रहे बल्कि सभी भूमिकाओं को अनुभव और ऊर्जा के साथ निभाया भी।    तबियत बिगड़ने से कुछ दिन पहले ही सुखासन में होने वाली भूपेंद्र बाबू की जयंती समारोह के तैयारी पर चर्चा भी की और कॉलेज चौक स्थित भूपेंद्र प्रतिमा स्थल के कार्यक्रम को स्वास्थ्य कारणों का हवाला दे नौ बजे करवाया था जो उनके सामाजिक दायित्वों के प्रति समर्पण को दिखाता है।विभिन्न स्तरों पर उनके द्वारा लिखित रचनाओं को स्थान और सम्मान मिला।राजनीति शास्त्र के स्थापित विद्वानों में उनकी गणना होती थी अक्सर शरद यादव सरीखे राजनेता भी अपने जीवन काल में इनसे वैचारिक मंथन करना पसंद करते थे।           83 साल की उम्र में अपनी आखिरी सांस लेने वाले डॉक्टर के के मंडल अपने पीछे पत्नी दो पुत्र तीन पुत्रियां सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गए।आजाद पुस्तकालय के सचिव डॉक्टर हर्ष वर्धन सिंह राठौर ने कहा विगत कुछ वर्षों में उनके सानिध्य में रहने के दौरान मिला अनुभव सामाजिक सांस्कृतिक शैक्षणिक सफर में मार्गदर्शक का काम करेगा।

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