जीवन को बोझ नहीं, वरदान बनाये:-लक्ष्मी सिन्हा

जब हम आत्मविश्वास और आशावादिता के साथ जीवन को ईश्वर की योजना मानकर स्वीकार करते हैं, तो जीवन एक साधन बन जाता है, बोझ नहीं

एक सड़क का आत्मबल तब प्रगट होता है, जब वह संकटों को साधना और अवसर की भूमि बना लेता है

पटना:-अखिल विश्व सत्य सनातन संघ की प्रदेश अध्यक्ष महिला प्रकोष्ठ श्रीमती लक्ष्मी सिन्हा ने आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने बहुत विस्तार पूर्वक सरल शब्दों में समझाते हुए कहा कि आध्यात्मिक पथ पर चलने वाला जब जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों से जुझता है, तो यह स्वाभाविक है कि उसके भीतर संशय जन्म ले,-‘कहीं मैं मार्ग से तो नहीं भटक गया? कहीं मेरे प्रयास निष्फल तो नहीं हो रहे हैं?’परंतु यह सभी साधक के मन के भ्रम, भय,संशय मात्र है। वास्तव में ऐसी कठिनाइयां साधक के शरीर, मन और बुद्धि के परिष्कार के लिए आती है। जिस प्रकार अग्नि में तप कर सोना शुद्धता को प्राप्त होता है, वैसे ही विपरीत परिस्थितियों में ही साधक की चेतना, विश्वास और आत्मबल का विस्तार होता है। रामायण में प्रेरणादायक उद्धरण है। भगवान श्रीराम जब बनवास को स्वीकार करते हैं, तो उन्हें एक बार भी परिस्थितियों को दोष नहीं दिया। पिता की आज्ञा पालन हेतु श्रीराम ने राजमहल के समस्त वैभव- विलास को छोड़कर बड़ी सहजता से वन में शांत, सरल और अनासक्त तपस्वी जीवन- शैली को अपनाया। इतना महानीय त्याग व तितिक्षा श्रीराम के अंत:करण की पवित्रता, उनके उच्चस्थ मनोबल व आत्मनियंत्रण और धर्मनिष्ठा कहीं परिचायक था। जब माता सीता का हरण हुआ, तब भी उन्होंने विलाप के स्थान पर विवेक और साहस का आश्रय लिया। यह दर्शाता है कि सच्चा साधक संकट में भी धैर्य और साहस नहीं छोड़ता। हे सबके पालनकर्ता, सबमें अवस्थित निहित, सैकड़ो प्रज्ञाओं और बलों से युक्त! तू ही हमारा पिता, पालक और उत्पादक है। तू ही माता के समान स्नेही और शिक्षक है, अतः हम तुझसे सुख की याचना करते हैं। वेद में सर्वत्र एक ईश्वर का ही वर्णन है। उसी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना का उपदेश है। ईश्वर ही इस पूर्ण ब्रह्मांड का एकमात्र सम्राट है। आगे श्रीमती सिन्हा ने कहा कि जब हम आत्मविश्वास और आशाबादिता के साथ जीवन को ईश्वर की योजना मानकर स्वीकार करते हैं, तो जीवन एक साधन बन जाता है, भोझ नहीं। विपरीत परिस्थितियां आत्म-विकास के लिए अवसर बन जाती है। एक साधक का आत्मबल तब प्रकट होता है, जब वह संकटों को साधना की भूमि बना लेता है।’आत्मोन्नयन की साधना’ के मार्ग पर केवल सुख-शांति, प्रसन्नता के अनुकूल कल में ही नहीं, अपितु प्रत्येक परिस्थिति में चलते रहना चाहिए। कठिन समय में सद्ग्रंथों का अध्ययन, सद्विचारों का मनन, सद्गुरु के वचनों का श्रवण और आत्मीय जनों का संग-यह सभी हमारी साधना में सहायक सिद्ध होते हैं। यही वे तत्व है, जो साधक को विचलित नहीं होने देते।                               सच्चे संबंध, माता-पिता, गुरुजन, मार्गदर्शक मित्र, ये जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्ति होते हैं। रामायण में श्रीराम और हनुमान जी का संबंध इस बात का प्रमाण है की कठिन समय में समर्पित और विवेकी साथियों का संंग किस प्रकार विजय का माध्यम बनता है। जब श्रीराम रावण की सेना के सम्मुख थे, तो हनुमान जी, विभीषण, जामवंत, नल-नील जैसे निर्भीक, अतुलित- शक्तिसंपन्न, धर्मपरायण सज्जन व निष्ठावान दिव्य पुरुष उनके साथ थे। यही उनकी आंतरिक और बह्मा शक्ति बनकर उभरे। जीवन प्रबंधन का एक अत्यंत सूक्ष्म सूत्र यह भी है कि हमारे चारों ओर केवल सांसारिक वैभव से संपन्न लोग नहीं, अपितु विचारशील, धर्मनिष्ठ और वीतराग महापुरुष भी रहे। विचार संपन्न, वीतराग महापुरुषों के संग- साथ से हमें सतत प्रेरणा मिलती रहती है और हमारे भीतर छिपी दिव्या संभावनाओं का जागरण होता है। प्रकृति का शाश्वत नियम है-परिवर्तन। रात्रि का घोरतम अंधकार भी प्रभात की सूचना है।’यह समय भी व्यतीत हो जाएगा’-यह वाक्य साधक के लिए केवल सांत्वना नहीं, बल्कि एक दिव्य सत्य है। जीवन निरंतर गति में है। श्रीमद्भगवत मैं कथा आती है कि जब प्रह्लाद को उसके पिता रूपी अत्याचारी हिरण्यकशिपु द्वारा बार-बार संकट में डाला गया, तभी वह विचलित नहीं हुआ। उसके आत्मविश्वास, भगवदद्धक्त और सत्य के प्रति निष्ठा ने उसे परमात्मा के साक्षात दर्शन कराए। यह दर्शाता है कि सच्चा साधना की जड़े और गहरी करता है। वह जो संकट में भी संयमित रहकर गुरु, शास्त्र और आत्मविवेक से प्रेरणा प्राप्त करता है- वही जीवन की अग्नि परीक्षा में खरा उतरता है। जब भी जीवन चुनौती पूर्ण हो, तब अपने भीतर झांकिए। राम, कृष्ण,ध्रूव, प्रह्लाद जैसे चरित्रों को स्मरण कीजिए। ईश्वर की योजना पर अटूट विश्वास रखिए। जानिए -जो कुछ घट रहा है, वह केवल परीक्षा नहीं, आपकी आत्मा में छिपे दिव्य स्वरूप को प्रकट करने का माध्यम है। साधक के लिए उचित यही है कि वह प्रत्येक प्रतिकूलता को तपस्या का एक अवसर माने और ‘शिवोऽहम्’-मैं शिवस्वरूप हूं-इस भाव से अपना पथ प्रशस्त करें।

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