मीडिया पर कॉरपोरेट कब्जे के खिलाफ ऐप्सो ने किया नागरिक कन्वेंशन का आयोजन

पटना:-अखिल भारतीय शांति व एकजुटता संगठन ( ऐप्सो) की और मीडिया पर पूंजीपतियों के कब्जे के खिलाफ नागरिक कन्वेंशन का आयोजन माध्यमिक शिक्षक संघ, जमाल रोड में किया गया। इस नागरिक कन्वेंशन में पत्रकारों के अलावा, समाज के विभिन्न क्षेत्रों-वकील, बैंककर्मी, रंगकर्मी, लेखक, साहित्यकार व छात्र, युवा, मजदूर सहित जनसंगठनों के प्रतिनिधि इकट्ठा हुए।           कन्वेंशन का संचालन ऐप्सो के कार्यालय सचिव जयप्रकाश ने किया स्वागत वक्तव्य ऐप्सो के जिला महासचिव भोला शर्मा ने किया। पटना जिला के दूसरे महासचिव कुलभूषण ने इस कन्वेंशन के लिए तैयार पेपर को प्रस्तुत करते हुए कहा ” आज मीडिया संस्थानों की स्थिति बेहद विकट है। आज आमलोगों की खबरें अखबारों में नहीं आ पा रही हैं। बल्कि इसके बजाय सांप्रदायिक एजेंडा वाली खबरों को प्रमुखता से प्रसारित किया जा रहा है।राजकुमार शाही ने ‘ऐप्सो’ के महासचिव ब्रजकुमार पांडे का आलेख प्रस्तुत किया। श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव कमलाकांत सहाय ने अपने संबोधन में पत्रकारिता के इतिहास से अवगत कराते हुए कहा ” 2014 से 24 के बीच मीडिया की विश्वसनीयता समाप्त हो चुकी है। जब मैं पत्रकारिता में आया था तो लगता था कि अच्छे प्रोफेशन में आ गए हैं। अब पत्रकारों के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया अच्छी नहीं होती।            लोग मुंह पर कह देता है की ‘जर्नलिस्ट तो बिका हुआ है’ और यह सब वह बोलता है जिसे खुद भी ज्यादा समझ नहीं आता है। जब यह कहा जाता है कि यह स्वीपिंग कमेंट है। सब लोग ऐसे नहीं है। लेकिन यही छवि बन गई है। बाहर से आने वाले लोग ज्यादातर पत्रकार होटल के कमरे में बैठकर रिपोर्ट लिखा करते हैं। हमलोग सच बोलने आए हैं लेकिन सच बोलने से किसको नफा-नुकसान हो रहा है यह सोचना हमारा काम नहीं है। सर पर कफ़न बांधने की बात कहना आसान है पर बांधना मुश्किल है। फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन से जब सरकार को दिक्कत होने लगती है तो वह राजद्रोह का कानून लेकर चली आती है जैसा 1870 में लाया गया। 1878 में वर्णाकुलर प्रेस एक्ट लाया गया। इसमें अंग्रेजी छोड़ दूसरी भाषाओं पर प्रतिबंध था। देश की आजादी में अखबारों की बहुत बड़ी भूमिका थी। आजादी के बाद वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट बना लेबर लॉ बना। लेकिन अब वर्तमान की सरकार के खिलाफ जो कोई बोलता है तो इमरजेंसी की याद दिलाई जाती है। जेपी पटना के कदमकुआं से बोलते थे वह देश भर के अखबार कवर करते थे लेकिन आज तो प्रधानमंत्री कुछ कर देते हैं तो कह दिया जाता है कि यह मास्टर स्ट्रोक मान लिया जाता है। एक सामान्य कार्यकर्ता तभी प्रधानमंत्री बन सकता है यह मीडिया की ताकत है। जब जनता के मन से चमक खत्म हो जाता है तब टीवी और स्क्रीन के चमक से कुछ नहीं होगा। टाइम्स ऑफ स्वराज के संतोष सिंह ने अपनी बात रखते हुए कहा ” हर चैनल किसी न किसी के पक्ष में खड़ा है। कोई निष्पक्ष नहीं है।            जो सत्ता में आएगा वह वैसा ही करेगा। यदि हेडिंग आपके अनुकूल नहीं है तो आप कहते कि मेरे अनुकूल होना चाहिए। आज सबसे ताकतवर राष्ट्रध्यक्ष है तो हमें हमारी हैसियत बता रहा है। पहले भी ऐसा होता था लेकिन पर्दे के पीछे चलने वाली चीजों को इसने उजागर कर दिया। जब तक आजादी के आंदोलन की मर्यादा बची रही तब तक ठीक रहा। अब समाज के सामने कोई रास्ता नहीं है। जिसके सामने से नौकरी छीनी जा रही है उसको नहीं समझ आ रहा है तो क्या कहा जाए। मैं तो अब युत्युबी पर आ गया हूं। मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। माध्यम बदल जाने से खुद को बदलना पड़ा। जैसे ही मेरे चैनल का व्यूरशिप एक लाख गया मुझे तीस पैंतीस हजार रुपया का प्रस्ताव आ गया। अभी एक फिल्म बनी ‘भक्चक’ जैसे ही मेरा नाम आया उसे दिखाना बंद कर दिया गया। ऐसी स्थिति आ गई है कि जो कोई भी थोड़ा सा मैटर करता है उसे अपने पक्ष में कर लेने की कोशिश कर ली जा रही है। मुझे लगता है नरेंद्र मोदी ने हमारे अंदर के खोखलेपन को उजगार कर दिया। यदि यह और कुछ वर्ष रह जाए तो हमारी आंखें खुल जाए तो बेहतर है। अब यदि यह सोचते हैं कि बदल देंगे तो बेकार है। यह मन कर चलिए पचास साल तक चलेगा। कुछ ही दिनों में कैसे मानसिकता बदल दिया। जो मुसलमान को देखा नहीं वह भी उसको गाली दे रहा है। स्कूल का टीचर यही पढ़ा रहा है बच्चों को कि मिया की लोगों को ठीक कर रहा मोदी। राम पर आप चर्चा करते तो वह इतना सफल नहीं हो पाता। हम लोग विदेश से ही चर्चा अधिक करते रहे हैं। हमलोग अब विज्ञपति पर पत्रकारिता कर रहे हैं। ‘आज’ अखबार के अमलेंदु ने कहा ” बहुत अच्छी शुरुआत हुई है। हमें देखना है अदानी और अंबानी के पास कितनी संपत्ति थी अब कितना है। अखबार से सरकार को ब्लैकमेल करके अपनी संपत्ति बढ़ाना चाहते हैं। हमलोग चाहते हैं कि खुद नेता बनने के चक्कर में संगठन को पॉकेट में रखते हैं। बिना सड़क पर उतरे , आंदोलन किए हुए कोई उपाय नहीं है। किसान आंदोलन का कवरेज न हो सके इसके लिए स्टार युत्युब चैनल को प्रतिबंधित कर दिया गया है। यदि मीडिया नहीं बचेगा तो क्या होगा। अब सबलॉग कहने लगा है कि देश में अघोषित आपातकाल है। स्वतंत्र पत्रकार अमरनाथ झा ने बताया अब जैसे अयोध्या में राममंदिर का इतना डंका बजाया गया लेकिन देखिए कोई रामानंदी संप्रदाय का आदमी नहीं गया। मीडिया में पूंजीपतियों पर कब्जा पहले भी था। आजादी के पहले भी ऐसा था। पहले घराना था। फिर ट्रस्ट से अखबार निकलने की प्रथा चली। लेकिन यह आगे नहीं बढ़ पाया। ट्रस्ट से निकलने वाला अखबार ‘ट्रिब्यून’ है। सवाल यह है कि ट्रस्ट वाला मॉडल क्यों नहीं सफल हो पाया। इंडियन एक्सप्रेस का जुट मिल था, सभी अखबारों का असली व्यवसाय कुछ और है।           यह हिंदी क्षेत्र का संकट है। आनंद बाजार पत्रिका जैसे अखबार एयर अखबार निकालते हैं कोई दूसरा धंधा नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस की ऐसी मंशा थी लेकिन यह आगे नहीं बढ़ पाया। इंडिया एक्सप्रेस में थोड़ी आजादी ज्यादा है। समाज के हर क्षेत्र को हिस्सा मिले। यदि उसमें पेशेवर रुख रहेगा तो ठीक रहेगा। एन.डी.टी.वी इस कारण खरीदा गया क्योंकि वह बाजार में चला गया। बाजार में हस्तक्षेप कर उसे खरीदा गया। ठेके पर पत्रकारों पर रखने का काम 1991 के बाद शुरू हुआ है। सरकार भी ठेके पर चल रही है। सरकार ढेर सारे कामों से खुद को पीछे खींच रही है। यह सरकार और समाज के पुंजीवादीकरण का नतीजा है। मीडिया प्रबंधन से जुड़े रहे कांग्रेस नेता आनंद माधव ने अखबारों में प्रबंधन से जुड़े अनुभवों के बारे में बताया मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है। टीवी नाइन का उद्घाटन करने जब गए तो कहा की विरोधियों से भर दिया। विरोध करने वालों की औकात बता दी जाती। छोटे से छोटे अधिकारियों का फोन टेप किया जाता है। कैसे व्यवस्था के विरोध की चीजों को जगह मिले यह ध्यान देना होगा। अखबार इवेंट को दरकिनार नहीं कर पाता। आज जो अर्श पर हैं वे फर्श पर कैसे आएं यह हमें प्रयास करना चाहिए। ‘बिहार हेराल्ड ‘ के संपादक बिद्युतपाल ने कहा ” मैं संपादक अचानक 2015 में बना। पहले हम जिसे साम्राज्यवाद कहते थे उस जगह पर भारतीय पूंजीपति वर्ग आ गया है। एक ऐसा प्लेटफॉर्म हो जहां किसी भी पत्रकार पर हमला हो उसका ध्यान रखा जाए। किसी भी सरकार हो उसकी कोशिश करनी चाहिए। पत्रकार सीटू तिवारी ने कहा ” ग्राउंड पर जो पत्रकार काम करते हैं वे अपना कुछ और कारोबार करते हैं क्योंकि बतौर पत्रकार घर बार नहीं चलता। हमारा 1956 में दिल्ली घोषणापत्र है जिसमें पत्रकारिता को व्यवसाय से अलग कर करना होगा। जब तक पत्रकारों को आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं किया जाएगा तक तक यह विलाप ही चलता रहेगा। शुक्रिया कहने पर हमें मुसलमान समझा जाता है। ऐसे पत्रकारों का नेटवर्क तैयार हो रहा है जिनको ग्राउंड का अनुभव नहीं है। न्यूजरूम का चरित्र वर्गीय हो गया है उस कारण पूंजीपतियों का कब्जा बढ़ता जा रहा है। विज्ञप्ति वैसे का वैसे ही छाप दिया जाता है। अपनी ओर से कोई मेहनत नहीं करते। मीडिया पर कब्जा 2014 से पहले का है। पैसा कहां से आ राह है यह देखना होगा। मीडिया पर कब्जा है इसकी समझ भी नहीं है। कन्वेंशन को क्षत्रपाल प्रसाद के अनुसार ” ऐसा प्रतीत हो रहा है कि देश तानाशाही की ओर जा रहा है। चौथे स्तंभ के लिए भी संघर्ष होना चहिए। सड़कों पर आवाज आनी चहिए। जिस दिन जनता को जगाने को सफल हो जायेंगी हमारी लड़ाई आगे बढ़ जायेगी। अभय पांडे ने कई उदाहरण देते हुए कहा कहा इंदिरा गांधी को प्रेस पर प्रतिबंध लगना पड़ा था आज तो उसकी जरूरत भी नहीं है। आज प्रधानमंत्री कार्यालय से एजेंडा सेट किया जा रहा है। मीडिया बता रहा है कि किसान आंदोलन जरूरी नहीं है। ऐसा फासिज्म है जो सबको तबाह करने पर तुला है। असिस्टेंट प्रोफेसर नीरज के अनुसार ” पत्रकार राज्य और बाजार से कैसे स्वतंत्र हो सके इसका उपाय सोचना होगा। प्राइम टाइम के नाम पर रिपोर्टिंग को समाप्त कर दिया गया। इसी चीज को यूट्यूब वाला भी ऐसे ही फॉलो करता है। अध्यक्ष मंडली की तरह राजीव रंजन वक्तव्य दिया। विनोद पासवान, प्रीति सिंह, अशोक गुप्ता, नीरज कुमार, विनिताभ आदि ने भी संबोधित किया।         कन्वेंशन के लिए बनी अध्यक्ष मंडली में थे गजनफर न्वान, राजीव रंजन, अर्चना और प्रीति सिंह, डी.पी यादव, अरुण मिश्रा, गोपाल शर्मा और सर्वोदय शर्मा ने भी संबोधित किया। कन्वेंशन में मसौढ़ी, बाढ़, खुसरूपुर आदि जगहों से आए लोग शामिल हुए। प्रमुख लोगों में थे अनिल कुमार राय, डी.पी यादव, कुमार सर्वेश, चंद्रबिन्द सिंह, मणिभूषण कुमार, बिट्टू भारद्वाज, पुष्पेंद्र शुक्ला, रमेश सिंह, सिकंदर-ए-आजम, रौशन कुमार, गोपाल शर्मा, मनोज कुमार, मदन प्रसाद प्रसाद, जितेंद्र कुमार, सुनील सिंह, पीयूष रंजन झा, भोला पासवान, अभिषेक कुमार आदि ने संबोधित किया।

व्हाट्सप्प आइकान को दबा कर इस खबर को शेयर जरूर करें

विज्ञापन बॉक्स (विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें)


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे
Donate Now
अब पायें अपने शहर के सभी सर्विस प्रवाइडर के नंबर की जानकारी एक क्लिक पर


               
हमारे  नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट , और सभी खबरें डाउनलोड करें
डाउनलोड करें

जवाब जरूर दे 

क्या आप मानते हैं कि कुछ संगठन अपने फायदे के लिए बंद आयोजित कर देश का नुकसान करते हैं?

View Results

Loading ... Loading ...


Related Articles

Back to top button
Close
Website Design By Mytesta.com