चुनौतियों को अवसर में तब्दील कर सोनी जगा रहीं हैं समुदाय में टीबी पर जागरूकता की अलख

पटना:- “एमडीआर(मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट) टीबी से मेरे पति का निधन हो गया. टीबी के लक्षणों को नजरंदाज करना उनकी मौत की वजह बनी. पति के मृत्यु के बाद मैं भी वर्ष 2018 में एमडीआर टीबी से ग्रसित हो गयी थी. मैंने अपने पति के मौत से सबक लेकर रोग को नजरंदाज नहीं किया. सरकारी अस्पताल में अपना ईलाज कराया।   चिकित्सक द्वारा सुझाये गयी दवाओं का पूरा कोर्स किया. मैं अपने पति को टीबी से तो नहीं बचा सकी. लकिन मैं टीबी को मात देने में सफ़ल रही. मैं समझती हूँ कि टीबी से मेरी लड़ाई एवं रोग से पति की मृत्यु ने मुझे पहले की तुलना में अधिक सशक्त इंसान बनाया. एक महिला होने के नाते ऐसे समय में अधिक सशक्त होने की जरूरत होती है. इसलिए मैंने भी खुद को मानसिक रूप से मजबूत किया. इसके कारण ही मुझे चुनौतियों को अवसर में बदलने की प्रेरणा मिली. अब मैं समुदाय को टीबी के बारे में जागरूक करती हूँ. लोगों को लक्षणों की पहचान के प्रति सतर्कता और नियमित दवा सेवन के महत्त्व के बारे में जागरूक करती हूँ”. यह कहते हुए जिला टीबी मुक्त वाहिनी से जुडी टीबी चैंपियन सोनी कुमारी के चेहरे पर एक आत्मविश्वास की लकीर फ़ैल जाती है. यह आत्मविश्वास टीबी उन्मूलन की बुनियाद को मजबूती प्रदान करती प्रतीत होती है. घर से हुई टीबी से जंग की शुरुआत:-सोनी बताती हैं कि टीबी से उनकी जंग की शुरुआत वर्ष 2015 से ही शुरू हो गयी. यह वही साल था जब उनके पति टीबी से ग्रसित हुए थे. वह बताती हैं कि शुरुआत में घरवालों ने कई निजी चिकित्सकों से इलाज कराया. लेकिन टीबी की पहचान नहीं होने के कारण स्थिति बिगडती चली गयी. जब स्थिति काफी नाजुक हो गयी तब जांच से पता चला कि वह एमडीआर टीबी से ग्रसित हैं. तब तक काफी देर हो चुका था. काफी प्रयास के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. सोनी पूरी कहानी बताते हुए भावुक हो जाती हैं. अपने आप को संभालते हुए कहती हैं कि पति की मृत्यु के सदमे से वह उबर भी नहीं पायी थीं कि वह भी टीबी से ग्रसित हो गयीं. उन्होंने हिम्मत दिखाकर सरकरी अस्पताल में अपनी जांच करायी और अपना इलाज शुरू किया. जून 2020 में उन्होंने एमडीआर टीबी को मात देकर स्वस्थ जीवन की शुरुआत की. टीबी को लेकर समाज को है अपनी सोच बदलने की जरुरत:-सोनी ने बताया कि व्यक्तिगत अनुभवों एवं टीबी मुक्त वाहिनी से जुड़कर काम करने के दौरान उन्हें टीबी को लेकर समुदाय में उदासीनता नजर आती है. अभी भी टीबी के रोगी को सामाजिक भेदभाव एवं कटाक्षों का सामना करता पड़ता है. टीबी एक संक्रामक रोग जरुर है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है की रोगी अछूत हो गया है. छोटी- छोटी सावधानियों को अपनाकर टीबी के रोगी का संबल बना जा सकता है. आमजन भी टीबी रोगी की पहचान कर उन्हें चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं. उन्हें अस्पताल तक ले जाकर जांच करवाने में मदद कर सकते हैं. “टीबी मुक्त वाहिनी” से जुड़कर जगा रहीं जागरूकता की अलख:-सोनी ने बताया कि वर्ष 2020 में “टीबी मुक्त वाहिनी” से जुड़कर उनके जीवन को एक नए उद्देश्य को समझने में मदद मिली. रोग से मिले कटु अनुभवों को उन्होंने संबल बनाकर समुदाय को टीबी से मुक्त करने का बीड़ा उठाया है।                                             वाहिनी के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर वह टीबी मरीजों की खोज करती है. संदिग्ध मरीजों को वह अस्पताल ले जाकर उनकी जांच करवाती है. जांच में टीबी की पुष्टि होने पर वे मरीजों को समुचित चिकित्स्य सलाह एवं उपचार प्राप्त करने में मदद करती हैं. मरीज के घर नियमित अंतराल में पहुंचकर उनका हाल जानती हैं एवं उन्हें उत्साहवर्धक बातों से प्रेरित करती हैं।

Live Cricket

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Don`t copy text!
Close
Close