मातृ मृत्यु रोकथाम में समुदाय से लेकर स्वास्थ्य तंत्र का दिख रहा एकीकरण

पटना:-राज्य में मातृ मृत्यु दर की रोकथाम में लिए अनेको तरह के नवाचार एवं प्रयोग किए जाते रहे हैं। इन नवाचार का नतीजा ही था कि वर्ष 2005 में बिहार का मातृ मृत्यु अनुपात 374 प्रति लाख जीवित जन्म था, जो देश में उच्चतम आंकड़ों में शामिल था। एसआरएस के आँकड़े बताते हैं कि अब बिहार में मातृ मृत्यु अनुपात घटकर लगभग 100 प्रति लाख जीवित जन्म रह गया है। स्वास्थ्य विभाग इसे 2030 तक वैश्विक सतत विकास लक्ष्य 70 पर लाने की रुप रेखा तैयार की जा रही है। एसडीजी के इस लक्ष्य का पीछा करने के लिए राज्य ने जिन नवाचार व प्रयोगों को अपनाया है,उनमें समुदाय स्तर पर उच्च जोखिम गर्भावस्था की पहचान उनके रेफरल प्रणाली को मजबूती और प्रसव पश्चात देखभाल शामिल है। राज्य में सितंबर 2025 तक आयोजित 4,13,952 स्वास्थ्य और पोषण दिवसों में 49,269 उच्च जोखिम गर्भवती महिलाओं की पहचान की गई, जो इस बदलाव में एक महत्वपूर्ण रोल निभाती है।          प्रयास-एक
सारण में आशा कार्यकर्ताओं और एएनएम ने लगातार प्रयास ने लोगों को मातृ स्वास्थ्य के विभिन्न पहलुओं पर लोगों को समझाया। उनके द्वारा फैलाई गयी जागरूकता ने अनेक जीवन सुरक्षित किए और त्वरित निर्णय लेने की आदत भी विकसित हुई। सारण में अप्रैल से सितंबर तक 84.7 प्रतिशत महिलाओं ने चार या उससे ज्यादा एएनसी कराया है।
प्रयास-2
वैशाली का महुआ एफआरयू ने सीमित संसाधनों के बावजूद अनुशासन और जवाबदेही के साथ प्रसवोत्तर रक्तस्राव प्रबंधन का प्रभावी मॉडल विकसित किया है। जहां आन कॉल सिस्टम और मल्टी टास्किंग रणनीति ने आपात स्थिति से निपटने में राज्य को एक नई दिशा दी। एक निष्क्रिय एफआरयू सक्रिय होकर हर महीने अब 15 सिजेरियन कर रहा है।
प्रयास-3
मुजफ्फरपुर के मातृ-शिशु अस्पताल में उपलब्ध प्रसवोत्तर रक्तस्राव किट और प्रशिक्षित कर्मचारियों ने हाल ही में एक गंभीर स्थिति में एक महिला निशा सोनी का जीवन बचाया। जिले के एमसीएच में 1848 प्रसव हुए इनमें से कुल 70 मामले पीपीएच के आए। इनमें से 99 प्रतिशत पीपीएच के मामलो का सफलता पूर्वक प्रबंधन पीपीएच बॉक्स के माध्यम से किया गया।

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