बच्चों में 70 फीसदी डायरिया मुंह के संक्रमण के द्वारा

पटना:- राजधानी के पुनाईचक स्थित एक किराए के मकान में रहने वाले और पेशे से प्लम्बर रंजीत के दो बच्चों को पिछले साल डायरिया हुआ। उन्हें यह डायरिया गंदे पानी के इस्तेमाल से हुआ था। रंजीत उस घटना को मायूसी से याद करते हैं, लेकिन उसकी सीख को अब जीवन में अमल में लाते हैं। रंजीत बताते हैं कि उस घटना के बाद से वह अपने बच्चों सहित खुद भी पानी उबालकर पीते हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, कम एवं मध्यम आय वाले देशों के बच्चों में शीर्ष पांच बीमारियों से होने वाली मौतों में डायरिया एक मुख्य वजह है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक वर्ष 2019- 21 में बिहार में पांच वर्ष तक के बच्चों में डायरिया का प्रसार दर लगभग 13.74 रहा। वहीं यूनिसेफ के अनुसार, विकासशील देशों में कोई बच्चा वर्ष में कम से कम तीन बार इस बीमारी से पीड़ित अवश्य होता है। मुंह के द्वारा ज्यादा संक्रमित होते हैं बच्चे:-डायरिया के प्रभावी कारकों के बारे में बताते हुए पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के पीडियाट्रिक विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ निगम प्रकाश नारायण कहते हैं कि डायरिया बच्चों में सबसे कॉमन लेकिन गम्भीर बीमारी है। गर्मी की शुरुआत होते ही यह अपना असर दिखाना शुरू करता है।          बच्चों में 70 फीसदी डायरिया मुंह के संक्रमण (रोटावायरस) से फैलता है। टीकाकरण में एमएमआर और रोटावायरस को शामिल कर डायरिया की गंभीरता से बचा जा सकता है। यह बीमारी काफी हद तक एक विशेष सामाजिक और आर्थिक परिवेश में भी पनपता है, जहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव हो। वहीं नालंदा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में महामारी रोग विशेषज्ञ डॉ मुकुल सिंह कहते हैं कि डायरिया की गंभीरता से बचाव तभी संभव है जब लोगों को ओआरएस और जिंक की उपयोगिता को अच्छे से समझाया जाए। पुरुष घर की स्वच्छता में अपनी भी भूमिका सुनिश्चित करें। इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म से डायरिया की नियमित मॉनिटरिंग और प्रबंधन में काफी सहायता मिली है। पिछले पांच वर्षों में ओआरएस उपयोग में हुई है वृद्धि:-राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 5 के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में पांच साल तक के वैसे बच्चे जिन्होंने डायरिया होने पर दो हफ्तों के अंदर ओआरएस घोल पिया, उनका प्रतिशत 58.2 है। ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर ओआरएस की उपलब्धता ने ग्रामीण क्षेत्रों में ओआरएस के उपयोग को शहरी क्षेत्रों से ज्यादा किया है। वहीं जिंक के इस्तेमाल में भी पिछले पांच वर्षों में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। समेकित बाल विकास योजना के तहत भी आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को व्यक्तिगत स्वच्छता और हाथ धोने की तकनीक बताई जाने के साथ हर केंद्र पर ओआरएस की उपलब्धता आशा या विभाग के द्वारा सुनिश्चित की जाती है। होम बेस्ड केयर के तहत नवजातों को 45 दिन तक की देखभाल के साथ, किशोर और किशोरियों के स्वच्छता और कुपोषण संबंधी सुधार के लिए भी कार्यक्रम चलाए जाते हैं। इसका भी सकारात्मक असर दिखने लगा है।

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